Sunday, May 6, 2018

I sell a house

Hello, I sell a house in Santander Spain for an amount of € 1400000 (you must pass it to your currency to see the exact amount). If you are interested in buying it, please send me a message and I will explain more details. I send you the plans of the house in PDF format.
Thanks for your time


Wednesday, May 2, 2018

साकार सपन 

कभी कुछ करने का मन में ,सपन हमने संजोया था 
प्यार से एक पौधे को  , जतन  से  हमने बोया था 
संवारा हमने तुमने मिल ,बड़ी मेहनत से सींचा है 
खुदा की मेहरबानी से ,गया बन अब ,बगीचा है 
बहारें आई अब इसमें ,फूल कितने महकते है 
दरख्तों पर ,रसीले से ,हजारों फल लटकते है 
यही कोशिश है हरदम ,कि आये कोई भी मौसम 
फले,फूले और हरियाली ,सदा इसकी रहे कायम 

मदन मोहन बाहेती;घोटू;
मेरी राधायें 

मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर के याद मुझे वो अक्सर आये 
मेरी पहली राधा मेरी पड़ोसिन थी 
जो नाजुक सी प्यारी,सुन्दर,कमसिन थी 
उसकी सभी अदाये होती दिलकश थी 
हाँ,वो ही मेरा सबसे पहला 'क्रश 'थी 
जिसे देख कर मुझको कुछ कुछ होता था 
मैं उसकी उल्फत के सपन संजोता था 
वो भी तिरछी नज़र डाल ,मुस्काती थी
 मेरे दिल पर छुरियां कई चलाती थी 
कभी पहल  मैं करता,नज़र झुकाती वो 
कभी पहल वो करती ,पर शर्माती वो 
चहल पहल होती थी लेकिन दूरी से 
मिलन हमारा हो न सका ,मजबूरी से 
उसकी चाहत में थे मेरे सपन रंगीले 
पर कुछ दिन में हाथ हो गए उसके पीले 
उस दिन पहली बार दिल मेरा टूटा था 
चखा प्यार का स्वाद ,किसी ने लूटा था
ये मन  मुश्किल  से समझा था ,समझाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधाये 
जो रह रह कर याद मुझे अक्सर आये 
दूजी राधा , सिस्टर जी  की सहेली थी 
उसे समझना मुश्किल ,कठिन पहेली थी
 यूं तो मुझको देख प्यार से मुस्काती 
पास जाओ तो बड़ा भाव थी वो खाती 
चंचल बड़ी ,चपल थी और सुहानी थी 
मैंने था तय किया कि वो पट जानी थी 
वेलेंटाइन डे पर उसे गुलाब दिया 
मंहगी मंहगी गिफ्टों से था लाद दिया 
इम्पोर्टेड चॉकलेट उसे थी  खिलवाई 
पर  वो लड़की ,मेरे काबू  ना आयी 
इसके पहले कि मैं आगे बढ़ पाता 
उसकी ऊँगली पकड़ ,कलाई पकड़ पाता 
मेरी प्यारी , सुंदर सी वो वेलेंटाइन 
हुई किसी लाला के घर की थी  लालाइन
और बह गए आंसूं में थे मेरे अरमां 
सुनते चार पांच बच्चों की है अब वो माँ  
सोचूं उसके बारे में ,तो मन तड़फाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर वो याद मुझे अक्सर आये 
कितनी राधायें ,यूं आयी जीवन में 
मीठी खट्टी यादें घोल गयी मन में 
था कोई का करना मस्ती मौज इरादा 
करने टाइम पास बनी थी कोई राधा 
कई बार हम खुद को समझे सैंया थे 
उन राधाओं के कितने ही कन्हैया थे 
लेकिन जो भी मिली वो सभी  राधाये 
जिनने पार करी  जीवन की बाधाएं 
कोई बन चुकी अब कोई की रुक्मण है 
कोई रम गयी,पूरी आज गृहस्थन है 
कोई  दुखी है अब तक अपने कंवारेपन में  
कोई रह रही  'लिविंग इन के  रिलेशन' में 
हमने अब राधा का चक्कर छोड़ दिया है 
फेरे ले ,रुक्मण संग ,मन को जोड़ लिया है 
अब समझे ,राधायें तो है आती,जाती 
पर रुक्मण ही जीवन भर का साथ निभाती 
बहुत सुख मिला ,उसको अपने हृदय बसाये 
फिर भी जीवन में आयी कितनी राधाये 
रह रह कर जो ,याद मुझे है अक्सर आये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
हम ओ सी के वासी 

ये ही हमारा वृन्दावन है ,ये ही मथुरा ,काशी 
शांति,प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

वानप्रस्थ की उमर ,जवानी का जज्बा है सब में 
मन में सेवा भाव भरा है  और  आस्था रब  में 
राधाकृष्ण यहीं मंदिर में ,दुर्गा माँ और हनुमन 
भक्तिभाव में और कीर्तन में ,रमता है सबका मन 
शर्बत,छाछ छबीले लगते ,और होते  भंडारे 
जन्म दिवस की ख़ुशी मनाते है मिलजुल कर सारे 
खुल कर हँसते लाफिंगक्लब में,मन में नहीं उदासी 
शांति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी
 
सुबह सुबह व्यायाम केंद्र में ,नित होती है कसरत 
काम सभी के सब आते है,जब भी पड़ती जरूरत 
क्रीड़ास्थल पर बच्चे  खेलें , और  गूंजे  किलकारी  
फव्वारों के पास मारती ,गप्पें ,महिला  सारी 
कोई सैर सवेरे करता ,कोई 'जिम' में जाता 
हमें यहाँ   दिखता हर चेहरा ,हँसता और मुस्काता 
खुशियां बरसे सदा,अमावस हो या पूरनमासी 
 शन्ति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

मदन मोहन बाहेती ' घोटू '

Monday, April 30, 2018

पढ़ाना हमको आता है 

चने के झाड़ पर सबको, चढ़ाना हमको आता है 
कोई भी काम में टंगड़ी अड़ाना  हमको आता है 
भले ही खुद परीक्षा में ,हो चुके फैल हो लेकिन,
ज्ञान का पाठ औरों को ,पढ़ाना हमको आता है 
कोई की भी पतंग को जब ,देखते ऊंची है उड़ती ,
तो उसको काटने पेंचें ,लड़ाना हमको आता है 
किसी की साईकिल अच्छी ,अगर चलती नज़र आती ,
उसे पंक्चर करें ,कांटे गड़ाना हमको आता है 
बिना मतलब के ऊँगली कर मज़ा लेने की आदत है ,
बतंगड़ बात का करके ,बढ़ाना  हमको आता है 
न तो कुछ काम हम करते ,न करने देते औरों को ,
कमी औरों के कामो में ,दिखाना हमको आता है 
हमारे सुर में अपना सुर ,मिला देते है कुछ चमचे ,
यूं ही हल्ला मचाकर के सताना हमको आता है 

घोटू 
बुढ़ापा छाछ होता है 

दूध और जिंदगी का एक सा अंदाज होता  है 
जवानी दूध होती है , बुढ़ापा   छाछ  होता है
 
दूध सा मन जवानी में ,उबलता है ,उफनता है ,
पड़े शादी का जब जावन ,दही जैसा ये जमता है 
दही जब ये मथा जाता ,गृहस्थी वाली मथनी में 
तो मख्खन सब निकल जाता ,बदल जाता है जो घी में 
बटर जिससे निकल जाता ,बटर का मिल्क कहलाता 
जो बचता लस्सी या मठ्ठा , गुणों की खान बन जाता 
कभी चख कर तो देख तुम ,बड़ा ही स्वाद होता है 
जवानी दूध  होती है , बुढ़ापा  छाछ  होता है 

दूध से छाछ बनने के ,सफर में झेलता मुश्किल 
गमाता अपना मख्खन धन ,मगर बन जाता है काबिल 
न तो डर  डाइबिटीज का ,न क्लोरोस्ट्राल है बढ़ता 
बहुत आसानी से पचता ,उदर  को मिलती शीतलता 
खटाई से मिठाई तक ,करने पड़ते है समझौते 
बुढ़ापे तक ,अनुभवी बन,काम के हम बहुत होते 
पथ्य बनता ,बिमारी का कई, ईलाज होता है 
जवानी दूध होती है ,बुढ़ापा  छाछ  होता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, April 25, 2018

वो अब भी परी है 

मेरी बीबी अब भी ,जवानी भरी है 
सत्रह बरस की ,लगे छोकरी  है 
उम्र का नहीं कोई उसमे असर है ,
निगाहों में मेरी वो अब भी परी है
 
भले जाल जुल्फों का ,छिछला हुआ है 
भले पेट भी थोड़ा ,निकला हुआ है 
हुई थोड़ी मोटी  ,वजन भी बढ़ा है 
भले आँख पर उनकी ,चश्मा चढ़ा है
मगर अब भी लगती है आँखें नशीली 
रसीली थी  पहले ,है अब भी रसीली 
वही नाज़ नखरे है वही है अदाए 
सताती थी पहले भी,अब भी सताये 
नहीं आया पतझड़,वो अब भी हरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी  है
 
भले अब रही ना वो दुल्हन नयी है 
दिनोदिन मगर वो निखरती गयी है 
भले तन पे चरबी ,जरा चढ़ गयी है 
मुझसे महोब्बत ,मगर बढ़ गयी है , 
बड़ी नाज़नीं ,खूबसूरत ,हसीं थी 
ख्यालों में मेरे जो रहती  बसी थी 
मगर रंग लाया है अब प्यार मेरा 
रखने लगी है वो अब ख्याल मेरा 
कसौटी पे मेरी ,वो उतरी  खरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी है

महकती हुई अब वो चंदन बनी है 
जवानी की उल्फत,समर्पण बनी है 
संग संग उमर के मोहब्बत है बढ़ती 
जो देखी है उसकी ,नज़र में उमड़ती 
 हम एक है अब ,नहीं दो जने है 
हम एक दूजे पर  ,आश्रित बने है   
जवानी का अब ना,रहा वो जूनून है 
देता मगर साथ उसका सुकून है 
मैंने सच्चे दिल से ,मोहब्बत करी है 
निगाहो में अब भी वो लगती परी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '