Wednesday, May 25, 2011

हंसी खो गयी

  हंसी खो गयी
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जंजालों में जीवन के इस कदर फंसे है
अरसा बीता,हम खुल कर के नहीं हँसे है
थे बचपन के  दिन वो कितने सुन्दर ,प्यारे
किलकारी गूंजा करती थी ,घर में सारे
खेल कूद,खाना पीना और पढना,लिखना
था आनंद बसा जीवन में हर पल कितना
आई जवानी प्यार हुआ तुमसे जब गहरा
आती थी मुस्कान देख तुम्हारा चेहरा
मन में मोहक छवि तुम्हारी ,सिर्फ बसी थी
जीवन में बस प्रेम भरा था ,हंसी ख़ुशी थी
और फिर ऐसा दौर आया ,मेरे जीवन में
दब कर ही रह गयी सभी खुशियाँ इस मन में
परेशानियाँ,चिंताओं ने ऐसा घेरा
दूर हुई सारी खुशियाँ,रह गया अँधेरा
कभी बिमारी ,कभी उधारी,कोर्ट,मुकदमा
कभी टूटना दिल का या लग जाना सदमा
चिंताओं में डूबे रहतें हैं हम सब की
जाने कहाँ ,हो गयी गम मुस्कानें लब की
और शिकंजा ,परेशानियाँ,खड़ी कसे है
अरसा बीता,हमको,खुल कर नहीं हंसें है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

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